Wednesday, 4 November 2015

इंडियन करंसी के हर नोट पर एक तस्वीर छपी होती है।यह तस्वीरें भारत के कल्चर और डेवलपमेंट के बारे में बताती हैं।



इंडियन करंसी के हर नोट पर एक तस्वीर छपी होती है। हर नोट के लिए अलग तस्वीर होती है। यह तस्वीर नोट के बैक साइड पर होती है। यह तस्वीरें भारत के कल्चर और डेवलपमेंट के बारे में बताती हैं। करंसी नोटों पर छपा हर फोटो यूनीक होता है।एक रुपए के नोट से लेकर 1000 रुपए तक नोट पर जो तस्वीर छपी होती हैं, उसका क्या मतलब होता है।

एक रुपए  एक रुपए के नोट पर ऑयल रिज (तेल उत्खनन मशीन) की तस्वीर होती है। ये फोटो बताता है कि भारत का विकास, औद्योगिक डेवलपमेंट के जरिए ही हो सकता है।
दो रुपए = दो रुपए के नोट दो तरह के होते हैं। एक नोट पर भारत के पहले उपग्रह आर्यभट्ट की तस्वीर छपी है। यह साइंस एंड टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भारत की उन्नति को दर्शाता है।...
 वहीं दो =रुपए के एक अन्य नोट पर रॉयल बंगाल टाइगर की फोटो छपी है। जो देश का राष्ट्रीय पशु है। यह हमारी शक्ति को प्रदर्शित करता है।
पांच रुपए = पांच रुपए के नोट पर ट्रैक्टर चलाते किसान की फोटो छपी है। यह तस्वीर दर्शाती है कि भारत के विकास में खेती की अहम भूमिका है।

10 रुपए=> 10 रुपए का नोट भी दो तरीके से छापा गया था। पुराने नोट पर मोर की तस्वीर लगी थी। यह भारत की संस्कृति एवं कला को दर्शाता है।


 वहीं 10 रुपए के अन्य नोट पर शेर, हाथी समेत कई जानवरों की तस्वीरों छपी हैं। यह नोट भारत की जैव विविधता (बायोडाइवर्सिटी) को दर्शाता है।
20 रुपए = 20 रुपए के पुराने नोट पर कोणार्क के सूर्य मंदिर में लगा चक्र दर्शाया गया है। यह भारत की भवन निर्माण (आर्किटेक्चर) में पुरानी समृद्ध कला को दर्शाता है।

 वहीं 20 के दूसरे नोट पर पाम (ताड़) के पेड़ की फोटो छपी है। इस नोट में अंडमान आइलैंड की तस्वीर है। यह भारत की समुद्री विविधता को दर्शाता...
50
रुपए = 50 रुपए के नोट पर संसद भवन की तस्वीर है। जो भारत की डेमोक्रेटिक वैल्यूज और ट्रेडिशन को दर्शाता है।
100 रुपए = 100 रुपए के नोट पर पहाड़ और बादल की तस्वीर है। यह फोटो भारत के सबसे ऊंचे माउंट कंचनजंघा से लिया गया है।


500 रुपए = इस नोट पर दांडी मार्च की तस्वीर लगी है। यह भारत की आजादी की लड़ाई का प्रतीक है। यह आंदोलन महात्मा गांधी ने अंग्रेजों द्वारा बनाए नमक कानून  तोड़ने के लिए शुरू किया था।

एक हजार रुपए= एक हजार रुपए पर गेहूं के पौधे, कम्प्यूटर, सैटेलाइट और टावर आदि बने हैं। एक हजार रुपए के नोट पर छपा फोटो इंडियन इकोनॉमी को इंडिकेट करता है।


दुनिया के मखाना उत्पादन में देश के इस क्षेत्र की हिस्सेदारी 85 से 90 फीसदी है।



सीमांचल और मिथिलांचल क्षेत्र एक खासियत के लिए दुनिया भर में जाने जाते हैं। और वह खासियत है यहां का वर्ल्ड फेमस मखाना। आपको जानकार हैरत होगी कि देश ही नहीं, बल्कि, दुनिया के 100 में से 90 देशों के लोग उत्तर-पूर्वी बिहार में पैदा होने वाले माखनों को बड़े चाव से खाते हैं। दुनिया के मखाना उत्पादन में इस क्षेत्र की हिस्सेदारी 85 से 90 फीसदी है। पर, एक सच यह भी है कि यहां का मखाना उद्योग उतना आर्गनाइज नहीं है, जितना उसे होना चाहिए था।

कहां-कहां होती है इनकी खेती


बिहार में मखाना के उत्पादन के लिए दरभंगा, मधुबनी, सुपौल और समस्तीपुर जिले जाने जाते हैं। मधुबनी जिले में ही 25,000 से ज्यादा तालाब हैं, जहां मखाने की खेती होती है।
 
90 फीसदी मखाना की खेती सिर्फ बिहार में
देश में लगभग 15 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में मखाने की खेती होती है, जिसमें 80 से 90 फीसदी उत्पादन अकेले बिहार में होता है। इसके उत्पादन में 70 फीसदी हिस्सा सिर्फ मिथिलांचल का है।लगभग 120,000 टन बीज मखाने का उत्पादन होता है, जिससे 40,000 टन मखाने का लावा प्राप्त होता है। देश में मखाने का कुल कारोबार 550 करोड़ रुपए का है।
कई फायदे हैं मखाने खाने के:
प्रति 100 ग्राम भुने मखाने में 9.7 फीसदी प्रोटीन, 75 फीसदी कार्बोहाइड्रेट, आयरन और वसा के अलावा 382 किलो कैलोरी मिलती है। इसमें दूध और अंडे के मुकाबले ज्यादा प्रोटीन पाया जाता है। अगर इसे नियमित खाया जाए तो यह काफी हेल्दी है।
ऐसे होती है मखाने की खेती:
मखाना पानी की एक घास है, जिसे कुरूपा अखरोट भी कहा जाता है। यह बिहार के उथले पानी वाले तालाबों में बढ़ने वाली घास है। इसके बीज सफेद और छोटे होते हैं, दिसंबर से जनवरी के बीच मखाना के बीजों की बोआई तालाबों में होती है। पानी की निचली सतह पर बीजों को गिराया जाता है। अधिक पानी वाले गहरे तालाब मखाने की खेती के लिए सही नहीं होते हैं। कम और उथले पाली वाले तालाबों में 1 से डेढ़ मीटर की दूरी पर बीज गिराए जाते हैं। एक हेक्टेयर तालाब में 80 किलो बीज बोए जाते हैं।
काले मखाने को ऐसे बनाया जाता है खाने लायक:
सूरज की धूप में बीजों को सुखाया जाता है। तब तक ये बीच काले होते हैं। फिर, बीजों के आकार के आधार पर उन की ग्रेडिंग की जाती है। उन्हें फोड़ा और उबाला जाता है। बिहार में कई परिवार आज भी इसे परपरांगत तरीके से ही तैयार करते हैं।
लाखों कमा सकते हैं अच्छी फसल से:
एक हेक्टेयर जमीन में एक हजार से 1500 किलो ग्राम तक मखाने उत्पन्न होते हैं। आमतौर पर मखानों से सलाना लगभग 17 लाख रुपए तक की कमाई हो जाती है।