Monday, 2 May 2016

वाल्मीकि रामायण में 4 ऐसे लोगों के बारे में बताया गया है, जिनका अपमान करना महापाप है।



वाल्मीकि रामायण में 4 ऐसे लोगों के बारे में बताया गया है, जिनका अपमान करना महापाप है। इन 4 का अपमान करने वाला चाहे कितनी ही पूजा-पाठ या दान-धर्म कर ले, लेकिन उसका पाप नहीं मिटता और उसे इसकी सजा भुगतनी ही पड़ती है। इसलिए, ध्यान रखें कि भूलकर भी आपसे इन 4 लोगों का अपमान हो जाए।
जानें कौन हैं ये 4 लोग-
मातरं पितरं विप्रमाचार्य चावमन्यते।
पश्यति फलं तस्य प्रेतराजवशं गतः।।
1. गुरु या शिक्षक
हमें शिक्षा और ज्ञान देने वाले को गुरु कहा जाता हैं। गुरु का दर्जा बहुत ऊंचा माना जाता है। सभी धर्म ग्रंथों में गुरु का सम्मान करने की बात कही गई है। जो छात्र अपने गुरु का सम्मान नहीं करता, उनकी दी गई शिक्षा का अनादर करता है, वह कभी भी सफलता हासिल नहीं कर पाता। गुरु का अपमान करने वालों को कभी भी सम्मान नहीं मिलता। ये एक ऐसा पाप कहा गया है, जिसका प्रायश्चित किसी भी तरह नहीं किया जा सकता। इसलिए कभी भी अपने गुरुओं का अपमान नहीं करना चाहिए।
2. ज्ञानी या पंडित
ज्ञानी और पंडित देवतुल्य माने जाते हैं। वे भी देवताओं के समान पूजनीय होते हैं। ज्ञानी लोगों की संगति से हमें कई लाभ होते हैं, हमारी किसी भी मुश्किल परिस्थिति का हल ज्ञानी मनुष्य अपनी सूझ-बूझ और अनुभव से निकाल सकता है। ऐसे लोगों का कभी भी अपमान नहीं करना चाहिए। ऐसे लोगों का अपमान करना महापाप कहा जाता है और इसके कई दुष्परिणाम झेलने पड़ सकते हैं। इसलिए, ज्ञानी या पंडितों का हमेशा सम्मान करें।
3. माता
मां को भगवान का दर्जा दिया जाता है। कई धर्म ग्रंथों में मां का सम्मान करने और भूलकर भी उनका अपमान करने के बारे में बताया गया है। माता की सेवा करने वाला मनुष्य जीवन में सभी सफलताएं पाता है। इसके विपरीत उनका अपमान करने वाला मनुष्य कभी खुश नहीं रह पाता। ऐसे मनुष्य पर भगवान भी रूठे हुए रहते हैं और उसे अपने किसी भी पुण्य कर्म का फल नहीं मिलता। इसलिए, ध्यान रखें किसी भी परिस्थिति में अपनी माता का अपमान करें।
4. पिता
हर मनुष्य को अपने माता-पिता में ही अपना पूरा विश्व जानना चाहिए। जो व्यक्ति अपने पिता का सम्मान नहीं करता, उनकी आज्ञा का पालन नहीं करता, वह पशु के समान माना जाता है। माता-पिता का अपमान करना मनुष्य का सबसे बड़ा अवगुण माना जाता है। ऐसा करने वाला मनुष्य चाहे कितनी ही तरक्की कर ले, लेकिन वह समाज में मान-सम्मान नहीं पाता। इसलिए किसी को भी अपने पिता का अपमान बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए।

Tuesday, 26 April 2016

हिंदू परम्पराओं से जुड़े ये वैज्ञानिक तर्क

एक गोत्र में शादी क्यूँ नहीं....
वैज्ञानिक कारण हैं..
एक दिन डिस्कवरी पर जेनेटिक
बीमारियों से सम्बन्धित एक ज्ञानवर्धक कार्यक्रम
देख रहा था ... उस प्रोग्राम में एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने कहा की जेनेटिक बीमारी न हो इसका एक ही इलाज है और वो है "सेपरेशन ऑफ़
जींस".. मतलब अपने नजदीकी रिश्तेदारो में विवाह नही करना चाहिए ..क्योकि नजदीकी
रिश्तेदारों में जींस सेपरेट (विभाजन) नही हो पाता और जींस लिंकेज्ड
बीमारियाँ जैसे हिमोफिलिया, कलर ब्लाईंडनेस, और
एल्बोनिज्म होने की १००% चांस होती है ..
फिर मुझे
बहुत ख़ुशी हुई जब उसी कार्यक्रम में ये
दिखाया गया की आखिर हिन्दूधर्म में
हजारों सालों पहले जींस और डीएनए के बारे में
कैसे
लिखा गया है ? हिंदुत्व में कुल सात गोत्र होते
है
और एक गोत्र के लोग आपस में शादी नही कर
सकते
ताकि जींस सेपरेट (विभाजित) रहे.. उस वैज्ञानिक ने
कहा की आज पूरे विश्व
को मानना पड़ेगा की हिन्दूधर्म ही विश्व का
एकमात्र
ऐसा धर्म है जो "विज्ञान पर आधारित" है !
हिंदू परम्पराओं से जुड़े ये वैज्ञानिक तर्क:
1- कान छिदवाने की परम्परा:
भारत में लगभग सभी धर्मों में कान छिदवाने की परम्परा है।
वैज्ञानिक तर्क-
दर्शनशास्त्री मानते हैं कि इससे सोचने की शक्त‍ि बढ़ती है। जबकि डॉक्टरों का मानना है कि इससे बोली अच्छी होती है और कानों से होकर दिमाग तक जाने वाली नस का रक्त संचार नियंत्रित रहता है।
2-: माथे पर कुमकुम/तिलक
महिलाएं एवं पुरुष माथे पर कुमकुम या तिलक लगाते हैं।
वैज्ञानिक तर्क- आंखों के बीच में माथे तक एक नस जाती है। कुमकुम या तिलक लगाने से उस जगह की ऊर्जा बनी रहती है। माथे पर तिलक लगाते वक्त जब अंगूठे या उंगली से प्रेशर पड़ता है, तब चेहरे की त्वचा को रक्त सप्लाई करने वाली मांसपेशी सक्रिय हो जाती है। इससे चेहरे की कोश‍िकाओं तक अच्छी तरह रक्त पहुंचता
3- : जमीन पर बैठकर भोजन
भारतीय संस्कृति के अनुसार जमीन पर बैठकर भोजन करना अच्छी बात होती है।
वैज्ञानिक तर्क- पलती मारकर बैठना एक प्रकार का योग आसन है। इस पोजीशन में बैठने से मस्त‍िष्क शांत रहता है और भोजन करते वक्त अगर दिमाग शांत हो तो पाचन क्रिया अच्छी रहती है। इस पोजीशन में बैठते ही खुद-ब-खुद दिमाग से एक सिगनल पेट तक जाता है, कि वह भोजन के लिये तैयार हो जाये।
4- : हाथ जोड़कर नमस्ते करना
जब किसी से मिलते हैं तो हाथ जोड़कर नमस्ते अथवा नमस्कार करते हैं।
वैज्ञानिक तर्क- जब सभी उंगलियों के शीर्ष एक दूसरे के संपर्क में आते हैं और उन पर दबाव पड़ता है। एक्यूप्रेशर के कारण उसका सीधा असर हमारी आंखों, कानों और दिमाग पर होता है, ताकि सामने वाले व्यक्त‍ि को हम लंबे समय तक याद रख सकें। दूसरा तर्क यह कि हाथ मिलाने (पश्च‍िमी सभ्यता) के बजाये अगर आप नमस्ते करते हैं तो सामने वाले के शरीर के कीटाणु आप तक नहीं पहुंच सकते। अगर सामने वाले को स्वाइन फ्लू भी है तो भी वह वायरस आप तक नहीं पहुंचेगा।
5-: भोजन की शुरुआत तीखे से और अंत मीठे से
जब भी कोई धार्मिक या पारिवारिक अनुष्ठान होता है तो भोजन की शुरुआत तीखे से और अंत मीठे से होता है।
वैज्ञानिक तर्क- तीखा खाने से हमारे पेट के अंदर पाचन तत्व एवं अम्ल सक्रिय हो जाते हैं। इससे पाचन तंत्र ठीक तरह से संचालित होता है। अंत में मीठा खाने से अम्ल की तीव्रता कम हो जाती है। इससे पेट में जलन नहीं होती है।
6-: पीपल की पूजा
तमाम लोग सोचते हैं कि पीपल की पूजा करने से भूत-प्रेत दूर भागते हैं।
वैज्ञानिक तर्क- इसकी पूजा इसलिये की जाती है, ताकि इस पेड़ के प्रति लोगों का सम्मान बढ़े और उसे काटें नहीं। पीपल एक मात्र ऐसा पेड़ है, जो रात में भी ऑक्सीजन प्रवाहित करता ह
7-: दक्ष‍िण की तरफ सिर करके सोना
दक्ष‍िण की तरफ कोई पैर करके सोता है, तो लोग कहते हैं कि बुरे सपने आयेंगे, भूत प्रेत का साया आ जायेगा, आदि। इसलिये उत्तर की ओर पैर करके सोयें।
वैज्ञानिक तर्क- जब हम उत्तर की ओर सिर करके सोते हैं, तब हमारा शरीर पृथ्वी की चुंबकीय तरंगों की सीध में आ जाता है। शरीर में मौजूद आयरन यानी लोहा दिमाग की ओर संचारित होने लगता है। इससे अलजाइमर, परकिंसन, या दिमाग संबंधी बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है। यही नहीं रक्तचाप भी बढ़ जाता है।
8-सूर्य नमस्कार
हिंदुओं में सुबह उठकर सूर्य को जल चढ़ाते हुए नमस्कार करने की परम्परा है।
वैज्ञानिक तर्क- पानी के बीच से आने वाली सूर्य की किरणें जब आंखों में पहुंचती हैं, तब हमारी आंखों की रौशनी अच्छी होती है।
9-सिर पर चोटी
हिंदू धर्म में ऋषि मुनी सिर पर चुटिया रखते थे। आज भी लोग रखते हैं।
वैज्ञानिक तर्क- जिस जगह पर चुटिया रखी जाती है उस जगह पर दिमाग की सारी नसें आकर मिलती हैं। इससे दिमाग स्थ‍िर रहता है और इंसान को क्रोध नहीं आता, सोचने की क्षमता बढ़ती है।
10-व्रत रखना
कोई भी पूजा-पाठ या त्योहार होता है, तो लोग व्रत रखते हैं।
वैज्ञानिक तर्क- आयुर्वेद के अनुसार व्रत करने से पाचन क्रिया अच्छी होती है और फलाहार लेने से शरीर का डीटॉक्सीफिकेशन होता है, यानी उसमें से खराब तत्व बाहर निकलते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार व्रत करने से कैंसर का खतरा कम होता है। हृदय संबंधी रोगों, मधुमेह, आदि रोग भी जल्दी नहीं लगते।
11-चरण स्पर्श करना
हिंदू मान्यता के अनुसार जब भी आप किसी बड़े से मिलें, तो उसके चरण स्पर्श करें। यह हम बच्चों को भी सिखाते हैं, ताकि वे बड़ों का आदर करें।
वैज्ञानिक तर्क- मस्त‍िष्क से निकलने वाली ऊर्जा हाथों और सामने वाले पैरों से होते हुए एक चक्र पूरा करती है। इसे कॉसमिक एनर्जी का प्रवाह कहते हैं। इसमें दो प्रकार से ऊर्जा का प्रवाह होता है, या तो बड़े के पैरों से होते हुए छोटे के हाथों तक या फिर छोटे के हाथों से बड़ों के पैरों तक।
12-क्यों लगाया जाता है सिंदूर
शादीशुदा हिंदू महिलाएं सिंदूर लगाती हैं।
वैज्ञानिक तर्क- सिंदूर में हल्दी, चूना और मरकरी होता है। यह मिश्रण शरीर के रक्तचाप को नियंत्रित करता है। चूंकि इससे यौन उत्तेजनाएं भी बढ़ती हैं, इसीलिये विधवा औरतों के लिये सिंदूर लगाना वर्जित है। इससे स्ट्रेस कम होता है।
13- तुलसी के पेड़ की पूजा
तुलसी की पूजा करने से घर में समृद्ध‍ि आती है। सुख शांति बनी रहती है।
वैज्ञानिक तर्क- तुलसी इम्यून सिस्टम को मजबूत करती है। लिहाजा अगर घर में पेड़ होगा, तो इसकी पत्त‍ियों का इस्तेमाल भी होगा और उससे बीमारियां दूर होती हैं।
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Monday, 7 March 2016

एलोपैथी कैप्सूल का सच

एलोपैथी कैप्सूल का सच
  आयुर्वेद को छोड़ कर जितनी भी चिकित्सा पद्धतियाँ है उनमे बनने वाली औषधियों मे बहुत अधिक मांसाहार का प्रयोग होता है ,आप जितनी भी एलोपैथी ओषधियाँ लेते है उन मे जो कैप्सूल होते है वो सब के सब मांसाहारी होते हैं ।दरअसल कैप्सूल के ऊपर जो कवर होता है उसके अंदर औषधि भरी जाती है वो कवर प्लास्टिक का नहीं होता आपको देखने मे जरूर लगेगा कि ये प्लास्टिक है लेकिन वो प्लास्टिक का नहीं है क्योंकि अगर ये प्लास्टिक का होगा तो आप उसको खाओगे तो अंदर जाकर घुलेगा ही नहीं ,क्योंकि प्लास्टिक 400 वर्ष तक घुलता नहीं है , वो कैप्सूल ऐसे का ऐसे सुबह टॉइलेट के रास्ते बाहर आ जाएगा ।तो मित्रो !!! ये जो कैप्सूल के खाली कवर जिस कैमिकल से बनाये जाते हैं, उसका नाम है gelatin (जिलेटिन ) । जिलेटिन से ये सब के सब कैप्सूल के कवर बनाये जाते है ,और जिलेटिन के बारे मे आप सब जानते है और बहुत बार आपने मेनका गाँधी के मुँह से भी सुना होगा की जब गाय के बछड़े या गाय को कत्ल किया जाता है , उसके बाद उसके पेट की बड़ी आंत से जिलेटिन बनाई जाती है तो ये सब के सब कैप्सूल मांसाहारी होते है ।आप चाहे तो मेरी बात पर विश्वास ना करें आप google पर (capsules made of ) लिख कर search करें । 1 नहीं 2 नहीं सैंकड़ों link आपको मिल जाएँगे ,जिससे आपको स्पष्ट हो जाएगा कि कैप्सूल जिलेटिन से बनाये जाते है
मित्रों !!! आपने एक और बात पर ध्यान दिया होगा 90 % ऐलोपैथी औषधियों पर कोई हरा या लाल निशान नहीं होता । कारण एक ही है इन ओषधियों मे बहुत अधिक मांसाहार का उपयोग होता है ,और कुछ दिन पहले कोर्ट ने कहा था की ओषधियों पर हरा या लाल निशान अनिवार्य होना चाहिए और ये सारी बड़ी एलोपेथी कंपनियाँ अपनी छाती कूटने लग गई थी ।कैप्सूल के अतिरिक्त मित्रों एलोपैथी मे गोलियाँ होती है ( tablets ) । तो कुछ गोलियाँ जो होती है जिनको आप अपने हाथ पर रगड़ेगे तो उसमे से पाउडर निकलेगा ,हाथ सफ़ेद हो जाएगा, पीला हो जाएगा ,वो तो ठीक है लेकिन कुछ गोलियां ऐसी होती है । जिनको हाथ पर घसीटने से कुछ नहीं होता उन सबके ऊपर भी जिलेटिन का कोटिंग किया होता है वो भी कैप्सूल जैसा है । वो भी सब मांसाहारी है ।थोड़ी सी कुछ गोलियां ऐसी है जिन पर जिलेटिन का कोटिंग नहीं होता ,लेकिन वो गोलियां इतनी खतरनाक है कि आपको कैंसर ,शुगर ,जैसे 100 रोग कर सकती हैं । जैसे एक दवा है पैरासिटामोल । इस पर जिलेटिन का कोटिंग नहीं है ,लेकिन ज्यादा प्रयोग किया तो ब्रेन हैमरेज हो जाएगा । ऐसे ही एक सिरदर्द की दवा है, उस पर भी जिलेटिन का कोटिंग नहीं ज्यादा प्रयोग किया तो लीवर खराब हो जाएगा , ऐसे ही हार्ट के रोगियों को एक दवा दी जाती है उसमे भी कोटिंग नहीं लेकिन उसको ज्यादा खाओ तो किडनी खराब हो जाएगी ।तो मित्रो !!! जिनके ऊपर कोटिंग नहीं है वो वो दवा जहर है और जिनके ऊपर कोटिंग है वो दवा मांसाहारी है , तो अब प्रश्न उठता है तो हम खाएं क्या ?मित्रो रास्ता एक ही आप अपनी चिकित्सा स्वयं करों अर्थात् आपको पुनः आयुर्वेद की ओर लौटना पड़ेगा । ठण्डा पानी पीना बन्द करें, गरम पानी पीएँ । इस क्रिया से सौ से अधिक रोग ठीक हो जाएँगे । फ्रिज का प्रयोग बन्द करें । देशी खाना खाएँ । खाना खाने से एक घण्टा पूर्व पानी पीएँ और खाना खाने के बाद डेढ घण्टे बाद पानी पीएँ ।एक काम आप और कर सकते हैं कि कोई भी विदेशी खाद्य पदार्थ और विदेशी उत्पाद स्किन से सम्बन्धित का प्रयोग सर्वथा बन्द कर दें । तभी आप सुरक्षित रह पाएँगे ।
मित्रो !!! दरअसल हमारे देश गौ ह्त्या मात्र मांस के लिए नहीं की जाती है इसके अतिरिक्त जो खून निकलता है,जो हड्डियों का चुरा होता है ,जो चर्बी से तेल निकलता है ,बड़ी आंत से जिलेटिन निकलती है ,चमड़ा निकलता है इन सब का प्रयोग कॉसमेटिक (सौन्दर्य उत्पाद ),टूथपेस्ट ,नेलपॉलिश ,लिपस्टिक खाने पीने की चींजे , एलोपेथी ,दवाइयाँ जूते ,बैग आदि बनाने मे प्रयोग किया जाता है , जिसे हम सब लोग अपने दैनिक जीवन मे बहुत बार प्रयोग मे लाते है ।तो गौ रक्षा की बात करने से पूर्व पहले हम सबको उन सब वस्तुओ का त्याग करना चाहिए जिनकी कारण जीव ह्त्या होती है , दैनिक जीवन मे प्रयोग होने वाली वस्तुओ की पहले अच्छे से परख करनी चाहिए फिर प्रयोग मे लाना चाहिए ।
इस जानकारी को अधिक से अधिक लोगो तक पहुंचाने मे
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Saturday, 20 February 2016

कैसे होता है काला जादू

काला जादू का नाम सामने आते ही भारत का बंगाल राज्य दिमाग में घूमने लगता है, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि भारत से ज्यादा काला जादू का उपयोग अफ्रीका में होता है। अफ्रीका का काला जादू वूडू नाम से जाना जाता है।
इसकी मुख्य विशेषता है इसमें इस्तेमाल होने वाले जानवरों के शरीर के हिस्से व पुतले। जिनका लोग सालों से उपयोग करते आ रहे हैं, लेकिन सामान्य लोगों के लिए आज भी ये विद्या एक रहस्य है। आइए जानते हैं क्या होता है काला जादू व इससे जुड़े रहस्य ...

कैसे होता है काला जादू

तंत्र विज्ञान के अनुसार, यह एक बहुत ही दुर्लभ प्रक्रिया है जिसे बहुत ही विशेष परिस्थितियों में अंजाम दिया जाता है। इसे करने के लिए उच्च स्तर की विशेषज्ञता की जरूरत होती है और कुछ ही लोग इसे करने में सक्षम होते हैं। इस प्रक्रिया में एक मूर्ति जो गुड़िया जैसी दिखती है, का उपयोग होता है। जिसे कई तरह की खाने की चीजों जैसे बेसन, उड़द के आटे आदि से बनाया जाता है। इसमें विशेष मंत्रों से जान डाली जाती है। उसके बाद जिस व्यक्ति पर जादू करना होता है उसका नाम लेकर पुतले को जागृत किया जाता है।
नोट- आजकल के समय में काला जादू संभव नहीं है, क्योंकि इसके सही जानकार न के बराबर है। इस लेख को हम सिर्फ एक जानकारी के तौर पर प्रकाशित कर रहे हैं न कि अंधविश्वास को बढ़ावा देने के लिए।
 

अफ्रीका और अन्य देशों में कहा जाता है वूडू

महामंडलेश्वर शिवानी दुर्गा के अनुसार, 1847 में एरजूली डेंटर नाम की वूडू देवी एक पेड़ पर अवतरित हुई थी। उसे सुंदरता और प्यार की देवी माना जाता था। यहां उसने कई लोगों की बीमारियां और परेशानियां अपने जादू से दूर कर दी। एक कैथोलिक पादरी को यह सब पंसद नहीं आया, उसने इसे ईशनिंदा करार देकर उस पेड़ के तने को काट डालने का आदेश दिया। इसके बाद में स्थानीय लोगों ने यहां देवी की मूर्ति बनाई और पूजा करने लगे।
 

किया जाता है जानवरों के अंगों का

उपयोग

वूडू में मुख्य तौर पर जानवरों के अंगो का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें जानवरों के अंगों से समस्या समाधान का दावा किया जाता है। इस जादू से पूर्वजों की आत्मा किसी शरीर में बुलाकर भी अपना काम करवा सकते हैं। इसके अलावा दूर बैठे इंसान के रोग व परेशानी के इलाज के लिए पुतले का भी उपयोग किया जाता है। वूडू जानने वालों का मानना है कि इस धरती पर मौजूद हर जीव शक्ति से परिपूर्ण है। इसलिए उनकी ऊर्जा का उपयोग करके बीमारियों को ठीक किया जा सकता है। वूडू में जानवरो जैसे की बंदर, मगरमच्छ, बकरी, ऊंट, लंगूर, छिपकली, तेंदुए आदि के अंग उपयोग में लाए जाते हैं।
 

काला जादू क्या होता है?

जानकारों का मानना है ये जादू और कुछ नहीं बस एक बंच ऑफ एनर्जी है। जो एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजा जाता है या कहें एक इंसान के द्वारा दूसरे इंसान पर भेजा जाता है। इसे Law of Conservation of Energy से समझा जा सकता है। जिसके अनुसार‘’Energy may be transformed from one form to another, but it can not be created or destroyed’’. हिंदी में कहा जाए तो ऊर्जा को न ही पैदा किया जा सकता है और न ही इसे खत्म किया जा सकता है।सिर्फ इसके स्वरूप को दूसरे स्वरूप मे बदला जा सकता है। यदि ऊर्जा का सकारात्मक इस्तेमाल है, तो नकारात्मक इस्तेमाल भी है। सनातन धर्म का अथर्ववेद सिर्फ सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के लिए ऊर्जाओं के इस्तेमाल को ही समर्पित है। आपको यह समझना होगा कि ऊर्जा सिर्फ ऊर्जा होती है, वह न तो दैवीय होती है, न शैतानी। आप उससे कुछ भी बना सकते हैं – देवता या शैतान। यह बिजली की तरह होती है। क्या बिजली दैवीय या शैतानी, अच्छी या बुरी होती है? जब वह आपके घर को रोशन करती है, तो वह दिव्य होती है। 
 

गीता में कहा गया है

अर्जुन ने भी कृष्ण से यही सवाल पूछा था कि आपका यह कहना है कि हर चीज एक ही ऊर्जा से बनी है और हर एक चीज दैवीय है, अगर वही देवत्व दुर्योधन में भी है, तो वह ऐसे काम क्यों कर रहा है? कृष्ण ने जवाब दिया, ‘ईश्वर निर्गुण है, दिव्यता निर्गुण है। उसका अपना कोई गुण नहीं है।’ इसका अर्थ है कि वह बस विशुद्ध ऊर्जा है। आप उससे कुछ भी बना सकते हैं। जो बाघ आपको खाने आता है, उसमें भी वही ऊर्जा है और कोई देवता, जो आकर आपको बचा सकता है, उसमें भी वही ऊर्जा है। बस वे अलग-अलग तरीकों से काम कर रहे हैं।
 

कब किया जाता था ये जादू

विशेषज्ञ मानते हैं पुतले से किसी इंसान काे तकलीफ पहुंचाना इस जादू का उद्देश्य नहीं है। इस जादू के लिए काला जादू शब्द भी गलत है, दरअसल, ये तंत्र की एक विधा है। जिसे भगवान शिव ने अपने भक्तों को दिया था। पुराने समय में इस तरह का पुतला बनाकर उस पर प्रयोग सिर्फ कहीं दूर बैठे रोगी के उपचार व परेशानियां दूर करने के लिए किया जाता था। उस पुतले पर रोगी का बाल बांधकर विशेष मंत्रों से उसके नाम के साथ जागृत किया जाता था। उसके बाद रोगी के जिस भी अंग में समस्या होती थी। पुतले के उसी अंग पर सुई को गड़ाकर विशेषज्ञ अपनी सकारात्मक ऊर्जा को वहां तक पहुंचाता था। कुछ समय तक ऐसा करने पर तकलीफ खत्म हो जाती थी। यही कारण है कि इसे रेकी और एक्यूप्रेशर का मिश्रण भी कहा जा सकता है। जिसमें अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा की सहायता से किसी को जीवन दिया जा सकता है।
 

कब हुआ गलत कामों में उपयोग

कुछ स्वार्थी लोगों ने इस प्राचीन विधा को समाज के सामने गलत रूप में स्थापित किया। तभी से इसे काला जादू नाम दिया जाने लगा। दरअसल, उन्होंने अपनी ऊर्जा का उपयोग समाज को नुकसान पहुंचाने के लिए किया। गौरतलब है जिस तरह काले जादू की सहायता से सकारात्मक ऊर्जा पहुंचाकर किसी के रोग व परेशानी को दूर किया जा सकता है। ठीक उसी तरह सुई के माध्यम से किसी तक अपनी नकारात्मक ऊर्जा पहुंचाकर। उसे तकलीफ भी दी जा सकती है।

Wednesday, 10 February 2016

Story भैंस की मौत

                           भैंस की मौत
एक दार्शनिक अपने एक शिष्य के साथ कहीं से गुजर रहा था। चलते-चलते वे एक खेत के पास पहुंचे। खेत अच्छी जगह स्थित था लेकिन उसकी हालत देखकर लगता था मानो उसका मालिक उस पर जरा भी ध्यान नहीं देता है।खैर, दोनों को प्यास लगी थी सो वे खेत के बीचो-बीच बने एक टूटे-फूटे घर के सामने पहुंचे और दरवाज़ा खटखटाया।अन्दर से एक आदमी निकला, उसके साथ उसकी पत्नी और तीन बच्चे भी थे। सभी फटे-पुराने कपड़े पहने हुए थे।दार्शनिक बोला, “ श्रीमान, क्या हमें पानी मिल सकता है? बड़ी प्यास लगी है!”
“ज़रूर!”, आदमी उन्हें पानी का जग थमाते हुए बोला।“मैं देख रहा हूँ कि आपका खेत इनता बड़ा है पर इसमें कोई फसल नही बोई गयी है, और ना ही यहाँ फलों के वृक्ष दिखायी दे रहे हैं…तो आखिर आप लोगों का गुजारा कैसे चलता है?”, दार्शनिक ने प्रश्न किया।“जी, हमारे पास एक भैंस है, वो काफी दूध देती है उसे पास के गाँव में बेच कर कुछ पैसे मिल जाते हैं और बचे हुए दूध का सेवन कर के हमारा गुजारा चल जाता है।”, आदमी ने समझाया।दार्शनिक और शिष्य आगे बढ़ने को हुए तभी आदमी बोला, “ शाम काफी हो गयी है, आप लोग चाहें तो आज रात यहीं रुक जाएं!”दोनों रुकने को तैयार हो गए।आधी रात के करीब जब सभी गहरी नींद में सो रहे थे तभी दार्शनिक ने शिष्य को उठाया और बोला, “चलो हमें अभी यहाँ से चलना है, और चलने से पहले हम उस आदमी की भैंस को चट्टान से गिराकर मार डालेंगे।”शिष्य को अपने गुरु की बात पर यकीन नहीं हो रहा था पर वो उनकी बात काट भी नहीं सकता था।दोनों भैंस को मार कर रातों-रात गायब हो गए!यह घटना शिष्य के जेहन में बैठ गयी और करीब 10 साल बाद जब वो एक सफल उद्यमी बन गया तो उसने सोचा क्यों न अपनी गलती का पश्चाताप करने के लिए एक बार फिर उसी आदमी से मिला जाए और उसकी आर्थिक मदद की जाए।अपनी चमचमाती कार से वह उस खेत के सामने पहुंचा।शिष्य को अपनी आँखों पे यकीन नहीं हो रहा था। वह उजाड़ खेत अब फलों के बागीचे में बदल चुका था… टूटे-फूटे घर की जगह एक शानदार बंगला खड़ा था और जहाँ अकेली भैंस बंधी रहती थी वहां अच्छी नस्ल की कई गाएं और भैंस अपना चारा चर रही थीं।शिष्य ने सोचा कि शायद भैंस के मरने के बाद वो परिवार सब बेच-बाच कर कहीं चला गया होगा और वापस लौटने के लिए वो अपनी कार स्टार्ट करने लगा कि तभी उसे वो दस साल पहले वाला आदमी दिखा।“ शायद आप मुझे पहचान नहीं पाए, सालों पहले मैं आपसे मिला था।”, शिष्य उस आदमी की तरफ बढ़ते हुए बोला।“नहीं-नहीं, ऐसा नहीं है, मुझे अच्छी तरह याद है, आप और आपके गुरु यहाँ आये थे…कैसे भूल सकता हूँ उस दिन को; उस दिन ने तो मेरा जीवन ही बदल कर रख दिया। आप लोग तो बिना बताये चले गए पर उसी दिन ना जाने कैसे हमारी भैंस भी चट्टान से गिरकर मर गयी। कुछ दिन तो समझ ही नहीं आया कि क्या करें, पर जीने के लिए कुछ तो करना था, सो लकड़ियाँ काट कर बेचने लगा, उससे कुछ पैसे हुए तो खेत में बोवाई कर दी… सौभाग्य से फसल अच्छी निकल गयी, बेचने पर जो पैसे मिले उससे फलों के बागीचे लगवा दिए और यह काम अच्छा चल पड़ा और इस समय मैं आस-पास के हज़ार गाँव में सबसे बड़ा फल व्यापारी हूँ…सचमुच, ये सब कुछ ना होता अगर उस भैंस की मौत ना हुई होती !“लेकिन यही काम आप पहले भी कर सकते थे?”, शिष्य ने आश्चर्य से पूछा।आदमी बोला, “ बिलकुल कर सकता था! पर तब ज़िन्दगी बिना उतनी मेहनत के आराम से चल रही थी, कभी लगा ही नहीं कि मेरे अन्दर इतना कुछ करने की क्षमता है सो कोशिश ही नहीं की पर जब भैंस मर गयी तब हाथ-पाँव मारने पड़े और मुझ जैसा गरीब-बेहाल इंसान भी इस मुकाम तक पहुँच पाया।”आज शिष्य अपने गुरु के उस निर्देश का असली मतलब समझ चुका था और बिना किसी पश्चाताप के वापस लौट पा रहा था।Friends, कई बार हम परिस्थितियों के इतने आदि हो जाते हैं कि बस उसी में जीना सीख लेते हैं, फिर चाहे वो परिस्थितियां बुरी ही क्यों न हों!हम अपनी जॉब से नफरत करते हैं पर फिर भी उसे पकड़े-पकड़े ज़िन्दगी बिता देते हैं, तो कई बार हम बस इसलिए नये business के बारे में नहीं सोचते क्योंकि हमारा मौजूदा बिजनेस दाल-रोटी भर का खर्चा निकाल देता है! पर ऐसा करने में हम कभी भी अपने full potential को realize नहीं कर पाते हैं और बहुत सी ऐसी चीजें करने से चूक जाते हैं जिन्हें करने की हमारे अन्दर क्षमता है और जो हमारी life को कहीं बेहतर बना सकती हैं।सोचिये, कहीं आपकी ज़िन्दगी में भी तो कोई ऐसी भैंस नहीं जो आपको एक बेहतर ज़िन्दगी जीने से रोक रही है…कहीं ऐसा तो नहीं कि आपको लग रहा है कि आपने उस भैंस को बाँध कर रखा है जबकि असलियत में उस भैंस ने आपको बाँध रखा है! और अगर आपको लगे कि ऐसा है, तो आगे बढिए…हिम्मत करिए, अपनी रस्सी को काटिए; आजाद होइए…आगे बड़े पर अपने व्यावसायिक जीवन को सफल बना कर उन्नति के पथ पर अग्रसर करे।

Friday, 29 January 2016

वायु शरीर के भीतर पांच भागो में स्थिर हो जाती है।

मानव शरीर में स्थित वायु को प्राण कहा जाता है और ये प्राण एक शक्ति है जिससे शरीर में चेतना का निर्माण होता है। अगर हम एक पल भी सांस लेना बंद कर दें तो हमारा जीवन संकट में आ जाता है। जब हम सांस लेते है तो हमारे अंदर जा रही हवा या वायु पांच भागो में बाँट जाती है या यूँ कहियें कि ये वायु शरीर के भीतर पांच भागो में स्थिर हो जाती है।
व्यान :-
व्यान वो प्राणशक्ति मानी जाती है जो रक्त में मिलकर पूरे शरीर में व्याप्त होती है और शरीर के सभी अंगो तक पौषक तत्वों को पहुँचती है। रक्त में मिलने के कारण ये वायु पूरे शरीर में घूमती रहती है और इसी तरह ये सारे शरीर में व्यक्ति के जीवन के लिए जरूरी सभी तत्वों को पहुंचती रहती है। अगर व्यान वायु न हो तो शरीर किसी भी कार्य को नही कर सकता । जब ये वायु कुपित हो जाती है तो शरीर में अनेक तरह के रोग होने की सम्भावना बढ़ जाती है। ये मुख्यतः मांस और चर्बी में कार्य करके ये इन्हें सेहतमंद रखती है। ये शरीर से मोटापे को कम करती है और शरीर को पुनः जवान बनती है।
समान :-
ये वायु शरीर के नाभिक्षेत्र में स्थित पाचन क्रिया में स्थित प्राणशक्ति की तरह ही होती है और ये शरीर की हड्डियों का संतुलन बनाये रखती है। हड्डियों तक हवा को पहुँचाना बहुत ही मुश्किल होता है और इसीलिए ये वायु शरीर के लिए बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। इसके न होने से हड्डियाँ कमजोर हो जाती है। इसको अधिक मात्रा में पाने के लिए आप जितनी ताज़ी और शुद्ध हवा ग्रहण कर सको उतना अधिक अच्छा है। इस वायु से हड्डियों में लचीलापन भी बढ़ता है जिसकी वजह से जोड़ो के दर्द की शिकायत कम होती है।
अपान :-
इसका अर्थ नीचे वाली वायु से होता है जो शरीर के रस में होती है। यहाँ रस से अर्थ जल और बाकी के तरल पदार्थों से है। अपान वायु पक्वाशय में स्थित होती है और इसका कार्य मल, मूत्र, शुक्र, गर्भ और आर्तव को बाहर निकलना होता है। इस वायु के कुपित होने से व्यक्ति को मूत्राशय और गुर्दे से सम्बंधित रोग हो जाते है। अपान वो वायु है जो मलद्वार से बाहर निकलती है।
उदान :-
ये गले में स्थित वायु होती है। इसी वायु की वजह से व्यक्ति का स्वर निकलता है, जिससे व्यक्ति बोल पाता है। इसका अर्थ ऊपर की वायु से है जो स्नायुतंत्र में होती है और इसे संचालित भी करती है। साथ ही इस वायु को मस्तिष्क की क्रियाओं को संचालित करने वाली प्राणशक्ति भी माना जाता है। ये वायु व्यक्ति के विशुद्धि चक्र को भी जगती है।
प्राण :-
प्राण वायु तीन स्थानों से स्थित रहती है। पहला मुख, दूसरा खून और तीसरा फेफडे। ये प्राणों को धारण कर जीवन प्रदान करती है। अगर ये वायु न हो तो व्यक्ति न तो कुछ खा पायेगा और न ही पी पायेगा। साथ ही ये हमारे शरीर का हालचाल बताती है। अगर प्राण वायु दूषित हो जाती है तो व्यक्ति को श्वास सम्बंधित अंगो के विकार हो जाते है। क्योकि ये वायु खून और फेफड़ों में भी स्थित होती है तो इसका महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। ये खून को भी साफ़ करती है और प्राणों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
इन सभी से मिलकर चेतना बनती है और मन संचालित होता है, जिससे शरीर का रक्षण और क्षरण होता है। अगर इनमे से किसी एक में भी दिक्कत आती है तो सभी प्रभावित होते है जिसके कारण मन, शरीर और चेतना में रोग और शोक आ जाता है। आगे हम बताएँगे की आयुर्वेदिक दवा कब और किस समय लेनी चाहिए। क्योंकि दवा का सम्बन्ध विकार से है। और विकार का सम्बन्ध वायु से है।

Tuesday, 19 January 2016

ताली बजाने से ठंड में निकलता है गर्म पानी

झारखंड के बोकारो जिले में एक पानी का कुंड ऐसा है, जहां ताली बजाने पर तेजी से पानी बाहर निकलता है। ऐसा लगता है मानो किसी बरतन में पानी उबल रहा हो।
ठंड में निकलता है गर्म पानी
यहां गर्मियों में ठंडा और सर्दियों में गर्म पानी निकलता है। लोगों का मानना है कि इसमें नहाने से चर्म रोग दूर होते हैं। साथ ही मन्नतें भी पूरी होती हैं। कुंड से निकलने वाला पानी जमुई नामक छोटी नाले से होते हुए गरगा नदी में मिलता है। इसे दलाही कुंड के नाम से जाना जाता है। कंक्रीट की दीवारों से घेरा हुआ छोटा जलाशय। बेहद साफ और औषधीय गुणों वाला है।(स्थानीय प्रचलन के अनुसार)।
कुंड पर शोध होना चाहिए


ऐसी जगहों पर पानी जमीन के बहुत नीचे से आता है। पानी का तापमान हमेशा फिक्स्ड होता है। तापमान घटना-बढ़ना शोध का विषय है। अगर इस पानी से नहाने पर चर्म रोग दूर होते हैं तो इसका मतलब इसमें गंधक और हीलियम गैस मिला हुआ है। ताली बजाने से ध्वनि तरंगों की वजह से पानी पर असर तो होता है लेकिन नीचे से ऊपर कैसे आता है यह पता करना होगा।
संक्रांति में लगता है मेला
वर्ष 1984 से यहां हर साल मकर संक्रांति पर मेला लगता है। लोग स्नान के लिए पहुंचते हैं। कुंड के पास दलाही गोसाईं नामक देवता का स्थान है। यहां हर रविवार लोग पूजा करने पहुंचते हैं।
बन सकता है पर्यटन केंद्र
2011-12 में पर्यटन विभाग ने इसकी दीवार बनवाई। इसके बाद इसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं गया। लेकिन प्रशासन चाहे तो यह बेहतरीन पर्यटन स्थल बन सकता है।
यहां जाने का रास्ता
बोकारो से करीब 27 किमी दूर। सड़क से जगासुर तक उसके बाद कच्चे रास्ते पर करीब 300 मीटर पैदल चलना पड़ता है।
तेलंगाना : ताली बजाओ, नंदी के मुंह से पानी पाओ
तेलंगाना के करीमनगर जिले में कल्वाश्रीरामपुर मंडल में स्थित एदुलापुर पहाड़ी पर भगवान शिव का मंदिर है। वहां भी नंदी के सामने ताली बजाने पर उसके मुंह से पानी निकलता है। इसका कारण स्रोत पता करने की कोशिश भू-वैज्ञानिकों ने की थी। लेकिन कारण पता नहीं कर पाए।